मनुष्य और समाज की बेहतरी का ज्ञान-विज्ञान - शिवप्रसाद जोशी
(विज्ञान में विचार के नये आयाम)समीक्षा पुस्तकः ज्ञान, विज्ञान, टेक्नोलॉजी और समाजः आम ज़बान में कुछ बातें लेखकः लाल्टूप्रकाशकः एकलव्यमूल्यः 200 रुपयेहिंदी कवि और प्रशिक्षण और पेशे से वैज्ञानिक लाल्टू...
View Articleक्या अपमान से निपटने के लिए उग्रता के अलावा कोई रास्ता है?
समीक्षा निबंध: प्रसांता चक्रवर्तीरॉक्सेन एल. यूबेन. ड्रिवेन टु देयर नीज़: ह्यूमिलिएशन इन कॉन्टेंपोरेरी पॉलिटिक्स. (प्रिंसटन और ऑक्सफ़र्ड: प्रिंसटन यूनिवर्सिटी प्रेस, 2025.)क्या अपमान और यातना के स्तर...
View Articleमोहन मुक्त की कविताएँ
कवि मोहन मुक्तमेरा पहाड़ ?????मुंडा कोलगोंड नागबौद्ध द्रविड़या हडप्पन बाद केजो कोई भी थे मेरे पुरखेउन्होंने कभी नहीं कहा ....'मेरा पहाड़'कम से कम रिकॉर्ड तो यही बताते हैंअगर कहा भी होतो कैसे जानें उनकी...
View Article`किसी अनजान ढाणी` से एक खरी-बेचैन आवाज़
`बौने प्रहसन और अन्य कविताएं`कविता संग्रहप्रकाशक - न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन``एक आवाज़ आई ये देश महान हैमैंने ग़ौर से देखा तो सदियों सेरक्त पिपासु देवताओं की लाल जीभ के सिवायकुछ दिखाई नहीं दिया।बेशक ग़ौर...
View Articleशाम के पृष्ठ पर एक असम्भव की तरफ़ खुलता कवि
अदनान कफ़ील दरवेश की कविता पर शिवप्रसाद जोशी अदनान,शाम के पृष्ठ पर एक असम्भव की तरफ़ खुलता है- उसकी यह काव्य-पंक्ति उसका परिचय है।अपने जीवन के तीसरे दशक में दाख़िल हो चुके अदनान कफ़ील दरवेश का यह तीसरा...
View Articleविनोद कुमार शुक्ल की कविता पर अच्युतानंद मिश्र
विसंगति की विडंबना60’ के दशक में जिन कवियों ने विशिष्ट कहन शैली से अपनी पहचान निर्मित की, विनोद कुमार शुक्ल उन थोड़े कवियों में से हैं. कवि के साथ-साथ उनकी ख्याति एक चर्चित कथाकार की भी रही है. उनके...
View Articleमृणाल सेन का संस्मरण: रात में फूल खिलते हैं, पानी मे बेलें फलती हैं
अगस्त 14-15, 1947. देश ने स्वतंत्रता की खुशियाँ मनाईं और विभाजन का मातम भी. एक ओर तो लोग अतीव आनंद की अवस्था में थे वहीं दूसरी ओर क्रोध और हताशा ने लाखों लोगों को चूर-चूर कर दिया था - पूर्वी बंगाल और...
View Articleयहाँ मेरा घर बन रहा है (मोहन मुक्त के कविता संग्रहः “हिमालय दलित है” पर कुछ...
वो तुम थे एक साधारण मनुष्य को सताने वालेअपने अपराध पर हँसे ठठाकर,और अपने आसपास जमा रखा मूर्खों का झुंड अच्छाई को बुराई से मिलाने के लिए, कि न छंट सके धुंध, बेशक हर कोई झुका तुम्हारे सामनेकसीदे पढ़े...
View Articleएक सुबुक आवाज़ की फैलती स्याही
(अदनान कफ़ील दरवेश की कविताओं पर कुछ बातें)शिवप्रसाद जोशी XVWe, the mortals, touch the metals, the wind, the ocean shores, the stones, knowing they will go on, inert or burning, and I was...
View Articleशैलेन्द्र के सवर्ण हिमायती: हुए तुम दोस्त जिस के दुश्मन उस का आसमां क्यूं हो
"शैलेन्द्र को मैं हिन्दी फिल्मों का सबसे बड़ा गीतकार मानता हूँ। हिन्दी फिल्मों में गीत रचयिता के रूप में बहुत बड़े-बड़े नाम हैं जैसे- मजरूह, साहिर, कैफ़ी आज़मी और मख़्दूम के भी कुछ गीत हैं लेकिन शैलेन्द्र...
View Articleपता नहीं चलता कि कब किस ने पाला बदल लिया है
प्रिय कवि लाल्टूका नया कविता संग्रह `कौन देखता है कौन दिखता` परिकल्पना प्रकाशन से छप कर आया है। इस संग्रह से कुछ कविताएँ यहाँ देते वक़्त इंटरनेट पर घूमते हुए प्रिय कवि नरेंद्र जैन की यह टिप्पणी मिली।...
View Articleशिवप्रसाद जोशी की किताब `रिक्त स्थान और अन्य कविताएँ`
शिवप्रसाद जोशी 1991 से कविताएँ लिख रहे हैं। 1947 के बँटवारे और व्यापक साम्प्रदायिक हिंसा के बाद गाँधी का क़त्ल कर अपनी ताक़त और मंशा का प्रदर्शन कर चुके जिन फ़ासिस्टों को सेकुलर लोकतांत्रिक नेताओ और...
View Articleट्रैजडी किंग और इंडियन सेकुलरिज़्म की ट्रैजडी : धीरेश सैनी
दिलीप कुमार (11 दिसंबर, 1922-7 जुलाई, 2021) पर बात शुरू करते हुए एम. एस. सथ्यू की फ़िल्म `गर्म हवा`की बड़ी शिद्दत के साथ याद आ रही है। बँटवारे के पस-ए-मंज़र बनी इस फ़िल्म के मुख्य पात्र आगरे के एक...
View Articleज़िंदा नहीं रहने दिया गया था आम्बेडकर से प्रभावित तिलक के बेटे को
(मशहूर बुद्धिजीवी सूरज येंगडेकी किताब `कास्ट मैटर्स` से लिया गया टुकड़ा जिसका हिन्दी अनुवाद भारत भूषण तिवारीने किया है।)जानकर हैरत होगी, ऐसे आम्बेडकर के एक और सहयोगी थे श्रीधरपंत तिलक जो रूढ़िवादी बाल...
View Articleवाम आंदोलन में भी अपने ऊपर दबंग जातियों की शक्ति महसूस करते हैं दलित - सूरज...
नव-उदारवादी धज के पूँजीवाद ने जो वायदे किए थे उनमें से अधिकतर पूरे नहीं हुए बल्कि इसने भारत के सबसे अधिक हाशिए के लोगों की मृत्युसंख्या में वृद्धि ही की. 1980 के दशक में आया नव-उदारवादी कॉरपोरेट...
View Articleआलोचना की आलोचना : फ़ासीवाद सम्बंधी अंक पर कृष्ण मोहन की समीक्षा
पिछले दिनों नामवर सिंह पर हिन्दी के `विद्वानों` के ताबड़तोड़ लाइव कार्यक्रमों के दौरान किसी ने उनके संपादन में `आलोचना` का पुनर्प्रकाशन शुरू होने पर पहला अंक (फ़ासीवाद और संस्कृति का संकट') फ़ासीवाद...
View Articleअमर शायरों की सफ़ में है राहत इंदौरी की जगह -धीरेश सैनी
अपनी विद्वता के `आइवरी टावर्स` में बैठे कवि-बुद्धिजीवी जो भी समझें, पर सच यही है, इत्ते बड़े मुल्क में, एक सीधी सी बात को ऐसे खरेपन से कह देना, राहत इंदौरी के ही हिस्से में आया था। हिर्स करो, पारसाई...
View Articleरैना महाराज के हाथों प्रेमचंद का शुद्धिकरण!
प्रेमचंद की एक बड़ी मज़े की कहानी है, 'बड़े भाई साहब'। थियेटर वालों को भी यह काफ़ी पसंद रही है। दो अभिनेताओं के द्वारा बिना किसी तामझाम के, बल्कि बिना किसी प्रॉप के, इस कहानी के शानदार मंचन भी देखे हैं और...
View Articleअपने विद्वेषी पूर्वजों के मोह में धूर्तता कर रहे हैं अपूर्वानंद?
पिछली पोस्ट से आगे अपूर्वानंद से बात कर रहे युवकों ने एक सीधे सवाल के जवाब में `कलाकार के अपने भीतर रहने`जैसी तमाम बातें झेलने के बाद फिर से अपने सवाल पर लौटने की कोशिश की। दब्बूपन से ही सही पर अपना...
View Articleअपू्र्वानंद की नई उपलब्धि : वाम के मंच से वाम पर हमला
भारत में वाम और उसकी सांस्कृतिक इकाइयां क्या बौद्धिक रूप से इतनी दरिद्र हो चुकी हैं कि वे लेनिन के विरुद्ध घृणा भरे अभियान चलाकर राजसत्ता की चापलूसी पर उतारु शख़्स को ही अपना मेंटर बना लें? इंडियन...
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